Sunday, February 15, 2009

"शब्द-ब्रह्म" डा. शैलजा सक्सेना


उसकी अँगुलियों से फिसलते
शब्दों की गडगडाहट ने डुबों दी
मेरी सारी कल्पनाएँ, सब विचार।

सामने स्क्रीन पर उभरता रहा
शब्दों का काला पर्दा
अर्थ अटके रह गये अँगुलियों के पोरों से
आँखों की सिकुडनों के बीच कहीं
फडफडाते हैं कटी पतंग से
या पीपल से बँधे मन्नत के धागों, चुनरियों से
मन का बालक लाँघता है आशाओं की छतें
झाँकता है सँभावनाओं के दालानों में.....

कि पकड ही लेगा
इस बार अर्थ की पतंग को
या मन्नत की पूर्ति के धागों को
और जीवन के सब शाश्वत प्रश्न
कर लेगा हल
कि हम क्यों हुए पैदा
कि हमारा किया सही रहा या गलत?
कि आयु हमारी सार्थक थी या नहीं?
कि हम चाहते क्या हैं आखिर?


मन का ह्ठी बालक
सदियों की गुत्थी का सुलझाना चाहता है
भटकता है एक अर्थ को...
केवल एक अर्थ को...
कौन कहता है कि शब्द ब्रह्म हैं???
क्यों भटकता है वह एक अर्थ को??
अर्थ- ब्रह्म को??

.......................................................................................................................................................................

1 comment:

विनय said...

अच्छी और गहरे भावों वाली रचना है!